Thursday, July 14, 2011

माँ..... सौरभ दुबे

 शब्द इंड़ो-यूरोपीय भाषा परिवार के सबसे पुराने शब्दों में एक है। इस शब्द की छाप आज भी इस कुनबे की ज्यादातर भाषाओं पर देखी जा सकती है। इसी वजह से संस्कृत का मातृ , जेंद अवेस्ता में मातर, फारसी-उर्दू में मादर, ग्रीक में meter , लैटिन mater यूनानी में जर्मन में muotar स्लाव में mati, डच में moeder और अंग्रेजी में मदर जैसे संबोधनसूचक शब्द देखने को मिलते हैं। विद्वान इस शब्द की उत्पत्ति अलग अलग ढंग से बताते हैं। संस्कृत में इसके जन्म के पीछे निर्माणसूचक ‘मा’ धातु मानी जाती है यानि जो निर्माण करे वह माँ। कुछ इसे मान् धातु से निकला शब्द मानते हैं अर्थात् जिसका मान-सम्मान व पूजा की जाए वह माता। मगर कई भाषाविज्ञानी उत्पत्तियों के इन आधारों को कपोलकल्पना मानते हैं और इसे ‘म’ वर्ण से निकला हुआ नर्सरी शब्द मानते हैं जो ध्वनि-अनुकरण प्रभाव के चलते एक ही आधार से उठकर भारतीय –यूरोपीय भाषा परिवार में फैलता चला गया। गौर करें कि शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् मम् , हुम्म् आदि,हिन्दी सहित कई भारतीय भाषाओं में मां के लिए अम्मा सहित इससे मिलते जुलते शब्द चलते है जैसे मराठी में आई, माई, माय, कन्नड़ में अम्ब जैसे शब्द दरअसल संस्कृत के अम्बा से निकले हैं जिसका अर्थ माँ है। भाषा ज्ञानियों के मुताबिक मुस्लिम समाज में बोला जाने वाला अम्मी शब्द भी इससे ही निकला है और अंग्रेजी के मॉम या मम्मी के पीछे भी यही आधार है। अम्बा शब्द का मूलआधार संस्कृत धातु अम्ब् है
   माँ, ये एक ऐसा शब्द है जिसकी महत्ता ना तो कभी कोई आंक सका है और ना ही कभी कोई आंक सकता है। इस शब्द मे जितना प्यार है उतना प्यार शायद ही किसी और शब्द मे होगा। माँ तो  अपने बच्चों को प्यार और दुलार से बड़ा करती है। अपनी परवाह ना करते हुए बच्चों की खुशियों के लिए हमेशा प्रयत्न और प्रार्थना करती है और जिसके लिए अपने बच्चों की ख़ुशी से बढकर दुनिया मे और कोई चीज नही है।कई बार ऐसा होता है की माँ को सब पता होता है जो हम बताते हैं वो भी और जो नहीं बताते वो भी। जैसे भगवान से कुछ नहीं छुपता वैसे ही माँ से कुछ नहीं छुपता। मैंने और शायद आपने भी इस सच्‍चाई को कई बार महसूस कि‍या होगा। हमारे सुख दुख की जि‍तनी साक्षी हमारी माँ होती है उतना शायद ही कोई ओर हो, भले ही फि‍र माँ सामने हो या ना हो। माँ सि‍र्फ एक रिश्‍ता नहीं होता वो एक संस्‍कार है, एक भावना है, एक संवेदना है। संस्‍कार इसलि‍ए क्‍योंकि‍ वो आपके लि‍ए सि‍र्फ और सि‍र्फ अच्‍छा सोचती है, भावना इसलि‍ए क्‍योंकि‍ वो आपके साथ दि‍ल से जुड़ी होती है और संवेदना इसलि‍ए क्‍योंकि‍ वो आपको हमेशा प्रेम ही देती है। माँ जिंदगी भर सि‍र्फ हमारे लि‍ए जीती है। हम कि‍तनी ही बार उससे उलझ लेते हैं। लेकि‍न वो हमेशा हमें उलझनों से नि‍कालती रहती है। जरा सोच कर देखिए कि हम हर उम्र में उसे अपनी तरह से तंग कि‍या करते हैं।बचपन में हमारा रातों को जागना और दि‍न में सोना, माँ हमारे लि‍ए कई रातों तक सो नहीं पाती, दि‍न में उसे घर की जि‍म्‍मेदारी सोने नहीं देती। तब हम अपने बचपने में उसे समझ नहीं पाते। जैसे जैसे हम बड़े होते हैं, हमारी पढ़ाई लि‍खाई की जि‍म्‍मेदारी भी उसकी ही है और साथ ही अच्‍छे संस्‍कारों की भी जि‍म्‍मेदारी भी उसकी ही होती है। बड़े होते ही हमारी अपनी सोच बनती है, हमें एक वैचारिक दृष्टि‍ मि‍लती है। अब मै माँ के बारे में  क्या बताऊ वैसे भी जितना मै जानता था उतना बता दीया और अंत में संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लि‍ए उसका संसार होता है।                                                              

Saturday, March 19, 2011

रंग बिरंगा होली.........सौरभ दुबे

आज तो होली का त्यौहार आते ही लोगो के दिलो पर एक अजीब ख़ुशी देखने को मिलती हें और हो भी क्यों ना यह एक बहुत पुराना पर्व हें जिसे हम सब होलिका के नाम से जानते हें होली का त्यौहार तंत्र के दृष्टि से भी होली का त्यौहार हम मनाते हें और कहा जाता हें की तत्र के आदि गुरु भगवान शिव माने जाते  हें और वो देवो के देव महादेव हें ,भगवान शिव ने अपना प्रथम बार तीसरी आँख फाल्गुन पूर्णिमा होली के दिन ही खोला था और कामदेव को भस्म कीया था इसलिए यह दिन तीसरी नेत्र जागृत दिन के रूप में मानते हें और तांत्रिक इस दिन विशेष साधना पूजा करते हें जिससे उन्हें भगवन शिव के तीसरे नेत्र से निकली हुयी ज्वाला का आनंद मिल सके और वो उस ज्वाला रूपी अग्नि को अपने अंदर छाये  हुए राग ,द्वेस,काम,क्रोध ,मोह ,माया के बिज को पूर्ण रूप से समाप्त कर सके ,होली  का  पर्व  पूर्णिमा  के  दिन  आता  है और  इस  रात्रि  से  ही  जिस  काम  महोत्सव   का  प्रारंभ  होता  है  उसका  भी  पूरे  संसार  में  विशेष  महत्त्व  है  क्योंकि  काम  शिव  के  तृतीय  नेत्र  से  भस्म  होकार  पूरे संसार  में  अदृश्य  रूप  में  व्याप्त  हो  गया . इस  कारण  उसे  अपने  भीतर  स्थापित  कर  देने  की  क्रिया  साधना  इसी  दिन  से  प्रारंभ  की  जाती  है , सौन्दर्य , आकर्षण , वशीकरण  , सम्मोहन  आदि  से  संबंधित  विशेष  साधनाएँ  इसी  दिन  संपन्न  की  जाती  है ,शत्रु  बढ़ा  निवारण  के  लिए , शत्रु  को  पूर्ण  रूप  से  भस्म  कर  उसे  राख    बना  देना  अर्थात  अपने  जीवन  की  बाधाओं  को  पूर्ण  रूप  से  नष्ट  कर  देने  की  तीव्र  साधनाएँ  महाकाली , चामुंडा , भैरवी ,  धूमावती , प्रत्यंगिरा  इत्यादि  साधनाएँ  भी  प्रारंभ  की  जा  सकती  हैं  तथा  इन  साधनों  में  विशेष  सफलता  शीघ्र  प्राप्त  होती  है ,
काम  जीवन  का  शत्रु  नहीं  है  क्योंकि  संसार  में  जन्म  लिया  है  तो  मोह -माया , इच्छा , आकांक्षा  यह  सभी  स्थितियाँ सदैव   विद्यमान  रहेंगी  ही  और  इन  सब  का  स्वरूप   काम  ही  हैं , लेकिन   यह  काम  इतना   ही  जाग्रत  रहना  चाहिए  की  मनुष्य  के  भीतर  स्थापित  शिव , अपने  सहस्रार  को  जाग्रत  कर  अपनी  बुद्धि  से  इन्हें  भस्म  करने  की  क्षमता  रखता  हो ,वैसे तो मै तंत्र होली के बारे मै ज्यादा  कुछ नहीं  जानता जितना जानता था उतना आप सबको बताने की कोशिस कर रहा हूँ ,वैसे तो होली के बारे में आप सबको मालूम ही होगा की होली कब और, क्यों मनाया जाता हें मै आप सबका ज्यदा समय न लेते हुए आप सब को होली की बधाई दे रहा हू आप सभी ब्लागर भाइयों को होली की बहुत -बहुत शुभकामनाये आइये इस ब्लाग को भी रंग बिरंगे कलरो से रंग दे
 होली मुबारक हो आप सभी को एक बार फिर से  
                                                                     सौरभ दुबे
 

Sunday, March 6, 2011

स्वामी रामदेव पर सियासी रंग चढ़ा .............सौरभ दुबे

इन दीनो स्वामी रामदेव पर सियासी रंग जोरो सोरो से दिख रहा हें ,पिछले दस वर्षो में रामदेव ने जबरदस्त लोकप्रियता पाई,इन दस सालो में रामदेव ने लोगो को सुबह उठना,योग करना सिखाया और आयुर्वेद के दुनिया में , लेकिन अब बाबा जी योग को ब्रेक दे दिए हें और कह रहे हें की हम योग भी सिखायेंगे और काला धन भी वापस ही लायेंगे लेकिन मै ये नहीं समझ पा रहा हूँ ,बाबा जी आप दो काम एक साथ कैसे करेन्गे या तो आप योग कराइए या तो राजनीती में आइये ,अब बाबा जी राजनेताओ को खुले आम धमकी दे रहे हें ,कह रहे हें की सारे नेताओ का नार्कोटेस्ट हो जिससे ये पता चलेगा की हर नेताओ के पास कितने काले धन जमा हें ,बाबा जी कहते हें की जिससे ये पता चलेगा की उन्होंने कहा कहा पैसा जमा कीया हे ,और बाबा जी कहते हें की युवावो को  मै तो राजनीती की शिक्षा दे रहा हूँ जो कम सरकार को करना चाहिए उसे मै कर रहा हूँ ,बाबा जी कहते  हें की देश में चार सौ लाख करोण रूपये भारत में काले धन के रूप में हे ,और ये तो ज्योतिष की भूमिका भी निभा रहे हें और कहते हें की ऐसा ही चलता रहा तो ये दस लाख करोण रूपये ये और लूटेंगे ,बाबा जी खुद को गाँधीवादी कह रहे हें और कहते हें की मै तो सिर्फ बापू की भूमिका निभा रहा हूँ ,अब तो ये अपने शिविर में योग  सिखाते-सिखाते राजनीती में चले जाते हें और राजनीती की बाते करते हें,और कहते हे की मेरे शिविर में रोज दो -दो लाख लोग मेरे पास आते हे ,

बाबा ये क्यों कह रहे हें ये मै नहीं समझा की वो ऐसा क्यूँ कह रहे हें वो तो आपसे योग सिखने के लिये आते हे ,अक्सर देखा गया हे बाबा एक ही परिवार के गाँधी नेहरु परिवार को हमेशा निशाना बनाते हे कहते हें की सारी सरकारी योजनाये एक ही परिवार को मिलती हें ,बाबा कहते हे की मै जहा बोलता हूँ वहा लाखो लोग खड़े हो जाते हें ,बाबा लाखो लोग को खड़ा क्यों कर रहे हो ये तो यही हुआ की गुड खाय गुलगुला से परहेज ,बाबा काले धन के पीछे पड़े हें और इनके पास  बेहिसाब सम्पति हें ,बाबा के पास सत्तर हजार करोण की सम्पति हे ,अभी इन्होने अमेरिका में सौ एकड़ जमीं ली है,और पांच सौ करोण का फ़ूड पार्क जिसका बजट बढ़ते -बढ़ते एक लाख करोण का हें ,और बाबा जी बिजनेसमें भी बनना चाहते हें जैसे  ये खुद की सौन्दर्य प्रसाधन की कम्पनिया भी खोलना चाहते हें ,बाबा जी कहते की हमारे भक्तो ने  सब हमे दान में दीया हें ,
दिग्विजय सिंह ने काले धन के बारे में दावा चलाने वाले बाबा रामदेव को कहा की पहले वो अपने धन के बारे में देखे ,
बाबा जी जो धन  आपको दान में मिल रहा है क्या वे ये  कह सकते हें की ये काला धन नहीं हें ,बाबा जी कहते हें की देश को पिछले ६४ सालो से लुटा जा रहा हें ,बाबा जी तो पुरे बीजेपी की राह पर चल रहे हें ,कांग्रेस पर हमेशा निशाना बनाते हें और कहते हें की ९०% करप्सन का जिम्मेदार कांग्रेस हें ,बाबा पीछे से  मत आइये जब राजनीती में आना ही हें तो खुल के आइये और लाखो जनता तो आपके आगे पीछे नाचती हें जैसा की आप कहते हें आइये और चुनाव लड़िये और देश को बदल दीजिये आखिर हम भी ये देंखे की आप सिर्फ बोलते हें की करते भी है , आप तो कहते हें मै चुनाव लडूंगा ही नहीं तब कैसे देश को सुधारेंगे क्या आपके पास कोई रेमोर्ट कंट्रोल है क्या,मै तो सिर्फ यही चाहता हू की आप एक बार आइये और दिखाइए की आप में कितना दम हें , उस दम को मै देखना चाहता हू की आप सिर्फ बोलते ही हें की करते भी हें,मैंने तो येही सुना है की 
                 जो गरजते हें वो बरसते नही 

Saturday, February 26, 2011

विधायको का दुष्कर्म---------------सौरभ दुबे


आज कल बलात्कार जैसे आम बात हो गई हें ,आये दिन न्यूज़ पेपर में हमे ऐसी न्यूज़ देखने को मिल जाती हें ,अभी आज ही  मैंने पढ़ा हें कि एनसीपी विधायक दिलीप वाघ पर बीस साल कि लड़की को नौकरी का झासा देकर दुष्कर्म किया  ,जानकारी के मुताबिक विधायक और उनके पिए महेश माली ने नासिक के एक गेस्ट हाउस में नौकरी दिलाने के नाम पर लड़की को बुलाया और उसके साथ दुष्कर्म कीया,पुलिस ने जाँच शुरू कर दिया हें विधायक अभी फरार हें ,यहा कि कानून व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों हें कि कोई किसी के साथ बलत्कार करने कि हिम्मत करे ,मै तो चाहता हू कि बलत्कार की सजा सात साल नही बल्कि  फाँसी होनी चाहिए जिससे किसी को भी बलत्कार करने की जल्दी हिम्मत नही पड़ेगी हम रोज न्यूज़ पेपर में देखते हें कि कही ना कही बलत्कार रोज हो रहा हें आखिर ये कब तक चलेगा नबालीगो के साथ दलितों के साथ कब तक चलेगा ये अब  तो सरकार को जागना ही चाहिए और कोई कड़ा कदम उठाना ही चाहिए, अभी मैंने देखा लखनऊ में किशोरी लड़की के साथ जबरदस्ती बलत्कार कीया ,किसी भी लड़की की जीवन ये समाज के हैवान दो पल में तबाह कर देते हें ,इनके अन्दर इंसानियत नाम की कोई चीज तो हें ही नही ,अब इस विधायक को ही देख लिजिये जब हमने इन्हें विधायक नही चुना था तब ये कहते थे ,माता जी ,बहन जी ,दादी जी ,भइया ,चचा  आदि, की फला-फला चुनाव चिन्ह पर ही मुहर लगाइए और हमे सेवा करने का मौका दीजिये, आज जब हम ने इनको चून  दीया तो आज ये सब आदर देना भूल गए साथ में यह भी भूल गये की    जिस जनता ने आज हमको यहा तक पहुचाया हें और उसी जनता के बहू बेटियों के साथ दुष्कर्म कर रहे हें ,अगर आपको नौकरी नही दिलानी थी तो साफ मना कर दीया होता ,क्या  बलत्कार करने के बाद ही नौकरी देंगे नौकरी तो दीया नही किसी को बदनाम जरुर कर दीया इन हैवानो को समाज में जीने का कोई अधिकार नहीं है खुद की बहू बेटियों को घर में छुपा के रखेंगे और दूसरो के बहू बेटियों के साथ दुष्कर्म करेंगे,   बस मै सरकार से इतना अपील करना चाहता हू की इन समाज के हैवानो को सरकार कड़ी से कड़ी सजा दे और दूबारा इन्हें कभी भी मंत्रिमंडल मै ना बैठने दे ,
                                                                                                   सौरभ दुबे

Wednesday, February 16, 2011

क्यों लिखता हूँ मैं ------------ सौरभ दुबे


हा कुछ लोगो ने मुझसे पूछा भईया आप ब्लॉगिंग मे क्यूं  आये , अभी तो आप बहूत छोटे हैं,और आपको समाज के बारे मे क्या मालूम होगा।तो मैने उन से कहा भईया अपनी बात कहने या एक दुसरे तक पहूचाने के लिये किसी समाजिक ज्ञान कि जरूरत नही होती।मैने तो यही सुना  और पढा हैं कि चार लोगो के मिलने से एक समाज बनता हैं।और यहा पर यह ब्लॉग एक समाजिक नेटवर्क हैं।हा एक बात और समाज मे हम बोल कर अपनी शब्दों को व्यक्त  करते हैं,और  ब्लॉग पर मौन रहकर यानी लिखकर अपने शब्दों को व्यक्त  करते हैं।दोनो ही एक समाज की तरह काम करते हैं।इसीलिये मैने अपने ब्लॉग का नाम कुछ बाते कलम से रखा हैं।इस ब्लॉग के माध्यम से मैं समाज मे होने वाले अच्छी तथा बूरी और युवाओ के लिये प्रेरणात्मक पोस्ट करुंगा ।मुझे देश और संस्कृति से लगाव हैं।अपनी  संस्कृति और  सभ्यता को देखकर मेरा मन व्याकुल हो उठता हैं।मै गरिबी और अमीरी के बीच जो असमानता फासला हैं।उस को कम करना चाहता  हूँ।और भी बहूत कुछ सोचता हूँ  देश के बारे मे, पक्षधर हूँ समान शिक्षा का,देश के विकाश कहे जाने वाले किसानो के उपर लगे हुये,गरिबी के ठप्पे को मिटाना चाहता हूँ।

सबको अपनी बात कहने का समान अधिकार होता है,वैसे कविर दास ने कहा है
                                ऐसी बानी बोलिये , मन का आपा खोय ।
                                औरन को सीतल करै , आपहुं सीतल होय ॥
और भी एक वाक्य किसी ने कहा था
                                    ‘बातहिं हाथी पाइए, बातहिं हाथी पांव’।

उपर वाले दोहे का अर्थ आसा है कि आप जानते होंगे,और दुसरे वाले  वाक्य का  अर्थ मै बता देता हु,कहने का मतलब यह है कि कुछ लोग बोलने से पहले कुछ सोचते नही बस बोल देते हैं।प्राचीन काल मे कुछ राजा बस वाणी से खूश होकर हाथी दे देते थे।खैर अब तो न राजा रहे और न ही हाथियों के माध्यम से पुरस्कार या सजा देने का चलन।पर आपके बोलने की कला का आज भी आपके जीवन पर लगभग उतना ही प्रभाव पड़ता है।इसलिये जो कुछ भी बोले सोच समझकर बोले।

                                                    शब्द सम्हार बोलिये, शब्द के हाथ न पाँव ।
                                                    एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव ॥
मेरे कहने का मतलब यह है कि सत्य बोलो,प्रिय बोलो,अप्रिय सत्य मत बोलो।अर्थात कुछ लोग सत्य बोलते है।लेकिन वो एसा सत्य बोलते है कि सामने वाले को बुरा लग जाये।सत्य तो सत्य है ही उसे डाइरेक्ट नही,इनडाइरेक्ट मे बोलना चाहिये।आज के समाज की सोच यह है कि हमें सिर्फ लाभ होना चाहिए चाहे उसके बदले नैतिकता ही क्यों ना दाव पर हो,मै आज के इस समाज के सोच को बदलने के लिये एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ।जिसके लिये मुझे आप सब की सहयोग चाहिये।और एक छोटा सा प्रयास हिन्दी भाषा के लिये हमारा प्रयास हिन्दी का विकास आईये हमारे साथ।
जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

             अगर आप मुझसे बात करना चाहें तो मेरा नम्बर है- 09312705299 ।
                                                                                                                      सौरभ दुबे
          
             





Monday, February 7, 2011

मन के हारे हार हे,मन के जिते जित


                                        वैसे तो यह दोहा कविर दास ने लिखा था ,कि
                  “मन के हारे हार हे मन के जिते जित ,कहे कविर गुरु पाईये मन हि के परपित"  
मै यह कहना चाहता हु कि आज कि युवा पिढी  जिवन मे कुछ भि खोना नहि चाहति,वो बस पाना चाहता है,अगर वो कुछ खोता है तो वो उसे दुबारा पाने कि कोशीस नहि करति,ओर वो दुसरे रास्तो पर भटक जाते है,
मै अपने बारे मे बताता हु मै डियु के एक कालेज मे पढता हु ,कुछ दिनो पहले यहि मेरि भी सोच थी,ओर मै भी यहि सोच रहा था कि मेरा कैरियर बरबाद हो गया ओर मै कमरे मे अपने आपको रखने लगा,बात कुछ एसि थि कि ,एक बार मै फेल हो गया था ओर दुसरे साल जब मैने दुबारा एडमिशन करवाया तो उसके कुछ महिने बाद हि मेरा  एक्सीडेंट हो गया,एक बार फिर मेरा पढाई खराब हो गई,मैने सोचा कि मेरा जिवन बरबाद हो गया,उन दो सालो कि तुलना मैने अपने पुरे जिवन से कर दीया,इससे पहले मैने अपने जिवन मे कुछ खोया नहि था, अब मेरे अन्दर हिन भावना आने लगि ओर मै खुद को बहुत कमजोर सोचने लगा,ओर अपनी तुलना दुसरे से करने लगा,उस समय मै यह सोच रहा था कि कब मै काबिल इन्सान बनुंगा ओर सफलता कब पाउंगा धिरे-धिरे मै अब अपने दुखो को भुलकर अपनी लाईफ मे वापस आ गया हु,उस समय मै किसि भि काम करने कि क्षमता मेरे अन्दर नहि थि,पहले मै किसि भि काम को चाहे कर पाऊ या न कर पाऊ मै बोलता था कि मै इसे कर लुंगा,लेकिन अब मेरे अन्दर यह क्षमता आ गई हैं,अब मै बोल सकता हु कि मै यह काम कर लुंगा,अब मै कर रहा हु पुरे जोश के साथ,मैने यह प्रेरणा कुछ महान हस्तियों  के जिवन से पाया,मै आपको इन महान हस्तियों  के बारे मे बताता  हु,
अब्राहम लिंकन -------------
       इनका जन्म १२ फरवरि १८०९ मे हुआ था,ये १८१६ सन मे इनडियना चले गये ओर अपना जवानि वहि गुजारि,जब ये ९ साल के थे तो तभि इनके माँ का देहान्त हो गया था,यह अपनी सोतेलि माँ के यह बहुत खुश थे जो इनको पढाति थि,ये बहुत गरिब थे,एक बार इनहोने अपने मिञ से किताब मांगा था,ओर वो किताब ओस मे भिग गया तो उनके मिञ ने उनसे उस किताब कि दाम मांगा,उनके पास पैसे नहि थे देने के लिये तब उन्होंने उसके खेत मे काम करके उस किताब का दाम अदा किया,वह किताबो से प्यार करते थे,लेकिन उसके पास पढने के लिये किताब नहि था,उनकि माँ उनको कोयले कि राख से पढाति थि,आपने २१ साल कि उमर मे बिजनेस ओर २२ साल मे चुनाव हार गये,आपने अपना बिजनेस फिर सुरु किया ओर २४ साल मे एक बार फिर से  बिजनेस मे माँत खा गये,इसके एक साल बाद हि इनकि पत्नी का देहान्त हो गया ओर इनका माँनसिक संतुलन कुछ हिल गया,३४ साल मे आपने कांग्रेस के चुनाव ओर ४५ साल मे सिनेट के चुनाव मे हार देखनि पणि, 47वें साल में वह उपराष्ट्रपति बनते-बनते रह गये,५२ साल कि उमर मे अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गये,अगर ये अपनी असफलताओंये देखकर पिछे मुण जाते या ये अपनी किस्मत समझकर हार माँन लेते,अगर ये चाहते तो अपनी वकालत फिर से सुरु कर सकते थे पर आपने एसा कुछ नहि किया ओर लडते रहे हार तो केवल सफर का भटकाव है, अंत नहि, ऐसे हि बहुत से लोगो ने ज़िंदगी मे  सफर  तय किया है,
जैसे लाल बहादुर शास्त्री इनको हि देख लिजिये ये पढने के लिये नदि पार करके स्कूल जाते थे ,इनके पास नाव से जाने के लिये पैसे नहि होते थे,आपने भि काफि संघर्ष  किया ओर एक दिन ये भारत के प्रधानमंत्री बने
थामस एडिसन को कौन नहि जानता इनहोने बिजलि का आविष्कार किया था,ये बस तिन महिने स्कूल गये थे,इनहोने दस हजार बलबो का आविष्कार किया सब मे इनको असफलताओं मिलि,लेकिन ये हार नहि माँने ओर ये अपने पथ पर लगे रहे आखिर इनहोने एक दिन सफलता पा हि लिया,उन्होंने अपने बरबाद हुये समय को बहुत किमति कहा ओर कहा हमाँरि सारि गलतिया जल के राख हो गई।
ओर बिजलि के आविष्कार के बाद इनहोने तिन हि हपतो के बाद हि फोनोग्राफ का आविष्कार कर दिया
इसि तरह बिथेवोन को युवासथा मे कहा गया था कि उनमे संगीत देने कि प्रतिभा  नहि है,लेकिन उन्होंने संगीत कि कुछ उत्तम  रचना दिया
एसे हि अगर हम इतिहास को  पढते है तो हमे ये पता चलता है कि हर सफलता कि भुमिका असफलताओं से सुरु हुई है,इतनि असफलताओं के बाद भि उन्होंने अपने  लगन को नहि छोडा ,ओर सफलता को पा हि लिया
हममे से कुछ लोगो अपने जिवन मे अपनी असफलताओं पर एक बार या दो बार कोशिस करते है,ओर बोलते है कि हमने पुरि कोशिस कर लिया लेकिन कुछ हासिल नहि हुआ,एक बात बताना चाहता हु कि असफलताओं हमे पिछे नहि,आगे बढाति है,असफलताओं हमे सिख देति है,ओर  अपनी असफलताओं से सिखते हुये आगे बढते हैं,अगर हम सब कामयाबि चाहते है तो हमे अपनी असफलताओं से सिख लेनि पडेगि,
हममे ओर उनमे फर्क सिर्फ़ इतना है कि वो अपनी असफलताओं के बाद जोश, हिम्मत के साथ उठ खड़े हुये ओर हम वो जोश ला नहि पाते,
                    ” नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा है कि”
                                ”संसार मे कुछ भि असम्भव नहि है
   अगर इन्सान लक्ष्य बना ले कि मुझे वो पाना है,चाहे जितना भि तुफान आये उसे विचलित नहि होना चाहिये
जैसे अर्जुन का लक्ष्य था चिड़िया कि आख मे तिर माँरना,तो उनहे केवल चिड़िया का आख दिखाई दे रहा था,उसि तरह हमे भि अपने लक्ष्य पर फोकस करना चाहिये।
                                                                                                                            सौरभ दुबे